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Showing posts from August, 2009

ख्वाब और सच्चाई

एक बार रात को हम सैर पर निकल पडे, उस सैर में हम जिंदगी से आगे चल पड़े रस्ते में हमें एक इंसान मिला, सुंदर और जवान मिला हमने पूछा, कौन हो तुम, वो बोला- तुम मुझे नही जानते , मैं ही लोगो की जिंदगी को रंगीन बनता हु, बैठे-बैठे ही उन्हें दूर-दराज की सैर करता हु मेरी वजह से ही गरीबी और अमीरी के बीच की खाई दूर होती है , मेरी वजह से ही जिंदगी भरपूर होती ही, मेरी वजह से ही गरीब आदमी सपने सजोता है , और भूखा रहने के बावजूद चैन से सोता है, मेरी वजह से ही जिंदगी में रुबाब होता है असल में मेरा नाम ही ख्वाब होता है मैंने कहा- तुम ही ख्वाब हो , जो आदमी को पागल बनता है , और गरीब आदमी को भी भरपेट खाना मिलने का झुटा सपना दिखलाता है ख्वाब बोला मैं झूठा ही सही, पर तुम्हारी सच्चाई से तो अच्छा हु तुम्हारी सच्चाई- गरीबो और अमीरों के बीच अन्तर बनती है , जबकि मैं गरीबो और अमीरों को जोड़ता हु , झूठे ख्वाब ही दिखलाता हु , पर गरीबो के चेहरे पर कुछ पल के लिए ही सही , हसी तो छोड़ता हु

जीवन का सार

पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, " ओह, मैं कितनी अकेली हूं ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुघ नहीं लेता। " हवा ने उसका रोना सुना। उस पर तरस आया। उसने पत्ते के हिला दिया कि बूंद फिलसकर नदी में जा मिले। बूंद अकर्मण्य थी। वह कसकर पत्ते से चिपक गई, " मुझे गिरने से डर लगता है। वैसे भी नदी के जल में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठूंगी। " नदी जल की बूंद आगे बढ हुई सागर में विलीन होकर शाश्वत में मिल गई। पत्ते पर की बूंद वहीं बैठी-बैठी सूखकर समाप्त हो गई। बूंद की सबसे बडी भूल थी कि वह स्वयं को अपने जन्मदाता जल से अलग मान बैठी। वह भूल गई कि उसका अस्तित्व जल से है। दूसरी भूल थी अर्कमण्यता। वह कर्म करने से डरती रही, अत: नष्ट हो गयी। बूंद और जल का सम्बन्घ आत्मा-परमात्मा के सम्बन्घ के समान है। इतने बडे विश्व मे बच्चा अकेला आता है। परिवार, समाज में अन्य लोगों से ...