मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँ मैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमे गाऊं* *अपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकर* *सुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।* *लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पे* *निगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता है* *हर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में * *फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।* *ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों का* *शर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन * *जिनके **तन को ढके हैं हाथ भर की कतरन* *जिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने * *जिनकी **डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकि* *उनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई है* *चूल्हा एक बार ही जला हो घर में लेकिन * *सिर्फ़ मेहनत की खायी है, मेहनत की खिलाई है। * *नज़र में घूमती है शक्ल उन मासूमों की * *ज़िन्दगी जिनकी अँधेरा , निगाह समंदर है ,* *वीरान साँसे , पीप से भरी धंसी आँखे* *फाकों का पेट में चलता हुआ खंज़र है।* *माँ की छाती से चिपकने की उम्र है जिनकी* *हाथ फैलाये वाही राहों पे नज़र आते हैं ।* *शोभित जिन हाथों में होनी थी कलमें * *हाथ वही बोझ उठाते नज़र आते हैं ॥ * *राह में घूमते बेरोजगार नोजवानों को* *देखता हूँ तो कलेजा मुह चीख उठता है* *जिनके दम से कल रोशन जहाँ होना था* *उन्हीं के सामने काला धुआं सा उठता है।* *फ़िर कहो किस तरह हुस्न के नगमें गाऊं* *फ़िर कहो किस तरह इश्क ग़ज़लें लिखूं* *फ़िर कहो किस तरह अपने सुखन में* *मरमरी लफ्जों के वास्ते जगह रखूं ॥* *आज संसार में गम एक नहीं हजारों हैं* *आदमी हर दुःख पे तो आंसू नहीं बहा सकता ।* *लेकिन सच है की भूखे होंठ हँसेंगे सिर्फ़ रोटी से* *मीठे अल्फाजों से कोई मन बहला नही सकता । । *
जीवन का सार
पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, " ओह, मैं कितनी अकेली हूं ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुघ नहीं लेता। " हवा ने उसका रोना सुना। उस पर तरस आया। उसने पत्ते के हिला दिया कि बूंद फिलसकर नदी में जा मिले। बूंद अकर्मण्य थी। वह कसकर पत्ते से चिपक गई, " मुझे गिरने से डर लगता है। वैसे भी नदी के जल में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठूंगी। " नदी जल की बूंद आगे बढ हुई सागर में विलीन होकर शाश्वत में मिल गई। पत्ते पर की बूंद वहीं बैठी-बैठी सूखकर समाप्त हो गई। बूंद की सबसे बडी भूल थी कि वह स्वयं को अपने जन्मदाता जल से अलग मान बैठी। वह भूल गई कि उसका अस्तित्व जल से है। दूसरी भूल थी अर्कमण्यता। वह कर्म करने से डरती रही, अत: नष्ट हो गयी। बूंद और जल का सम्बन्घ आत्मा-परमात्मा के सम्बन्घ के समान है। इतने बडे विश्व मे बच्चा अकेला आता है। परिवार, समाज में अन्य लोगों से ...
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