जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ और मनती रही खून की होलियाँ तो एक दिन हकीकत हम भूल जायेंगे होली और दिवाली से भी घबराएँगे । हो न पायेगी पहचान रंग और खून में जो पानी - सा लहू यूं ही बहता रहा अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा । जो छूटते रहे उपद्रवी स्वार्थ पर फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर तो और कुछ तो अंजाम होगा नहीं बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।
जीवन का सार
पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, " ओह, मैं कितनी अकेली हूं ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुघ नहीं लेता। " हवा ने उसका रोना सुना। उस पर तरस आया। उसने पत्ते के हिला दिया कि बूंद फिलसकर नदी में जा मिले। बूंद अकर्मण्य थी। वह कसकर पत्ते से चिपक गई, " मुझे गिरने से डर लगता है। वैसे भी नदी के जल में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठूंगी। " नदी जल की बूंद आगे बढ हुई सागर में विलीन होकर शाश्वत में मिल गई। पत्ते पर की बूंद वहीं बैठी-बैठी सूखकर समाप्त हो गई। बूंद की सबसे बडी भूल थी कि वह स्वयं को अपने जन्मदाता जल से अलग मान बैठी। वह भूल गई कि उसका अस्तित्व जल से है। दूसरी भूल थी अर्कमण्यता। वह कर्म करने से डरती रही, अत: नष्ट हो गयी। बूंद और जल का सम्बन्घ आत्मा-परमात्मा के सम्बन्घ के समान है। इतने बडे विश्व मे बच्चा अकेला आता है। परिवार, समाज में अन्य लोगों से ...
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