जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ और मनती रही खून की होलियाँ तो एक दिन हकीकत हम भूल जायेंगे होली और दिवाली से भी घबराएँगे । हो न पायेगी पहचान रंग और खून में जो पानी - सा लहू यूं ही बहता रहा अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा । जो छूटते रहे उपद्रवी स्वार्थ पर फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर तो और कुछ तो अंजाम होगा नहीं बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।

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