ग़ज़ल

कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गए
क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए
गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंठ से
याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गए
जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह
पर निगाहों से मेरे दिल की कहानी कह गए
दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था
शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए
दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ
फ़ासले बढ़ते गए, नक़्शे-क़दम ही रह गए
ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का
नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गए
दूसरी ग़ज़ल-
भूल कर ना भूल पाए, वो भुलाना याद है
पास आए, फिर बिछुड़ कर दूर जाना याद है
हाथ ज़ख़्मी हो गए, इक फूल पाने के लिए
प्यार से फिर फूल बालों में सजाना याद है
ग़म लिए दर्दे-शमां जलती रही बुझती रही
रौशनी के नाम पर दिल को जलाना याद है
सूने दिल में गूँजती थी, मद भरी मीठी सदा
धड़कनें जो गा रही थीं, वो तराना याद है
ज़िन्दगी भी छाँव में जलती रही यादें लिए
आग दिल की आँसुओं से ही बुझाना याद है
रह गया क्या देखना, बीते सुनहरे ख़्वाब को
होंठ में आँचल दबा कर मुसकुराना याद है
जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह
अब उमीदे-पुरसिशे-ग़म को भुलाना याद है

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