क्रिकेट को दौलत की कैद में मत डालिए

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के 37वें जन्मदिन पर किसी भी क्रिकेटप्रेमी का भावुक हो जाना लाजमी है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने पेशे को नई ऊंचाइयां देते हैं और लोग उनमें नए युग का प्रतिबिंब देखने लगते हैं। सचिन और अमिताभ ऐसी ही शख्सियत हैं। जाहिर है जब पूरा देश यह कामना कर रहा है कि सचिन लंबी उम्र जीयें और अपने कीर्तिमानों के पहाड़ को इसी तरह बढ़ाते रहें, तब क्रिकेट की दशा, दिशा के बारे में भी कई सवाल मन में उठते हैं। आईपीएल को लेकर जो कुछ भी हो रहा है वह किसी भी खेल को पूरी तरह झकझोरता है।
यह ठीक है, हम बाजारू अर्थव्यवस्था में जी रहे हैं। यह ऐसा दौर है, जहां हर चीज दौलत के तराजू पर तौली जाती है और इसीलिए नैतिकता को भी प्रबंधकीय फंडे में ढाला जा रहा है। जहां जुनून का मतलब अपनी निजी सफलता है और जितना हो सके उतना चुराकर इन्कम टैक्स चुका देने में देशभक्‍ति। आज कोई भी खिलाड़ी यह नहीं कहता कि शतक मारते समय मेरे दिमाग में देश घूम रहा था। वह गए शुक्रवार की शाम थी। मौका था, हिन्दुस्तान टाइम्स के चंडीगढ़ संस्करण की दसवीं सालगिरह का। तमाम लोग खुशी के इस मौके पर इकठ्ठा थे। वहीं उड़नसिख मिल्खा सिंह मिल गए। मैंने उनसे कहा कि आप बचपन से हमारे हीरो रहे हैं। कुछ अपने बारे में बताइए। सहज भाव से वे बोले कि 1954 में दिल्ली में मेरा मुकाबला पाकिस्तानी धावक से था। मैं उस समय नंगे पैर दौड़ता था, क्योंकि आजकल के जैसे दौड़ने वाले जूते देश में ईजाद नहीं हुए थे और यदि उपलब्ध थे भी, तो उनकी आमद हिन्दुस्तान में नहीं थी। खैर मैंने उस रेसर को ट्रैक पर पछाड़ दिया। बाद में जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुझे पुरस्कार दिया, तब उस समय उन्हें बताया गया कि यह वही लड़का है जिसने पाकिस्तानी धावक को ‘पीट’ दिया था। पंडित जी ने मेरी पीठ थपथपाई। हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी वह फोटो आज भी मेरे पास है।
मिल्खा सिंह ठीक से रहते हैं, परंतु उनका शुमार धनकुबेरों में नहीं होता। मुझे नहीं लगता कि इससे उन्हें कोई फर्क पड़ता है। 75 वर्ष की उम्र में वे अपने से तीन दशक छोटे लोगों से भी ज्यादा चुस्त-दुरुस्त नजर आते हैं। उनके चेहरे पर पसरा संतोष और देह में दौड़ता देशप्रेम बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है। बहुत साल पहले जब मैं बच्चा था, तब एक बार वीनू मांकड़ को देखा था। वे रिटायर हो चुके थे और उनके बेटे अशोक मैदान में थे। कहा जाता था कि वीनू की माली हालत ठीक नहीं, पर उनके चेहरे पर मैंने कोई असंतोष नहीं पाया था। उस समय के खिलाड़ी उन सैनिकों की तरह हुआ करते थे जो देश की आन की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे और बदले में आत्मसंतोष के सहारे शेष जिंदगी गुजार देने को तैयार रहते थे।
सुनील गावस्कर की अगुवाई में जब क्रिकेट को पेशेवर जामा पहनाने की बहस चली थी, तब भी कहा गया था कि खेल रोमांच के लिए है, रगों में दौड़ती सनसनी के लिए है, देश और समाज की शान के लिए है, पैसे के लिए तो कतई नहीं। शुक्र है कि उस समय उदारीकरण और आर्थिक सुधारों की आंधी नहीं चली थी। कैरी पैकर का ख्वाब भी जमींदोज हो गया था। 13 मई 1977 को उन्होंने जिस कैरी पैकर वर्ल्ड सीरिज का एलान किया था, वह 2 साल में दफन हो गई। लगने लगा था कि क्रिकेट की पवित्रता कम से कम पैसे से भंग नहीं होगी। पर यह सिर्फ एक हसीन ख्वाब था। सोवियत संघ के पतन के बाद पूरी दुनिया में अमीर बनने की अजब सी चाहत पैदा हो गई है। अब हिट और फिट का फार्मूला किसी भी जज्बे से ज्यादा मायने रखता है। पर इसने क्या हमारे ऊपर क्षणभंगुरता का तत्व नहीं थोप दिया है?
जरा सोचिए। अब कोई गायिका लता मंगेशकर क्यों नहीं होती? मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश जैसी अनश्वरता अब किसी गायक में क्यों नहीं है? चेतन भगत एक उपन्यास लिखते हैं और छा जाते हैं। अरुंधती राय को विदेशी जमीन से मिला एक ईनाम कहां से कहां पहुंचा देता है। उनके लेखन में मौजूदा काल की कितनी भी पहचान भले ही अभिव्यक्त होती हो पर प्रेमचंद जैसा सामाजिक यथार्थ कहां बिला गया है? क्या वजह है कि गोस्वामी तुलसीदास शताब्दियां बीत जाने के बावजूद अभी तक हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवि हैं। क्या वजह है कि कोई परदेशी अगर हमसे देश के सबसे बड़े साहित्यकार का नाम पूछता है तो हम चुप हो जाते हैं।
भारतीय संगीत के साधक अब किसी मेहर की देवी के चरणों में नहीं बैठते। दरगाहों से कव्वालों का नाता टूट गया है और मंदिरों में कोई कला विकसित नहीं होती। हर तरफ बाजार है। ऐसा लगता है जैसे मन की हर रचनात्मक धड़कन पर किसी दुकान का हक है। इसीलिए आज कोई क्रिकेटर या खिलाड़ी राष्ट्रीय गौरव के रूप में जाना और बूझा नहीं जाता। धोनी महान खिलाड़ी हैं पर उनकी पहचान देश की तरुणाई से नहीं, उन उत्पादों से होती है जिनके लिए वे मॉडलिंग करते हैं। एमटीवी पर दिखाए गए एक शो को यदि सही मान लें तो धोनी की सालाना आमदनी 110 करोड़ रु., युवराज की 80 करोड़ रु. और द्रविड़ की 22 करोड़ रु. है। यह वह देश है जहां प्रतिव्यक्‍ति सालाना आय अभी भी 33,500 रु. है।
क्रिकेट ने अपनी प्रभुता को बरकरार रखा है। अंग्रेजों का दिया हुआ औपनिवेशिक खेल आज भी प्रभुवर्ग की याद दिलाता है। यह ठीक है कि आज तमाम क्रिकेटर गलियों में खेलकर यहां तक पहुंचे हैं। पर जहां पहुंचे हैं वहां से नीचे देखना उन्हें गवारा नहीं है। करोड़ों कमाने वाले ये लोग अपनी आय का आधा प्रतिशत भी क्रिकेट के कद को ऊंचा बढ़ाने पर खर्च नहीं कर रहे हैं। बीसीसीआई की कुल आय हिन्दुस्तान की जीडीपी के मुकाबले दसियों गुना तेजी से बढ़ी है। देश में क्रिकेट को संचालित करने वाली यह संस्था 2007-08 में 1000.41 करोड़ का वजूद रखती थी। 2005-06 में इसकी हैसियत सिर्फ 33 करोड़ रु. थी। मतलब साफ है कि देश का सबसे तेजी से उभरते कमाऊ उद्योगों में क्रिकेट भी है। आईपीएल इसकी जरूरतें पूरी करने का नया जरिया है।
कहने को हम कह सकते हैं कि आईपीएल ने क्रिकेट को जिस तेजी से बढ़ाया है उससे दुनिया सिमट गई है और देशों की सीमाएं टूट गई हैं। पर यह काम तो हथियारों और नशे के सौदागरों ने भी किया है। आतंकवादियों के संगठित गिरोह भी यही कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार हिन्दुस्तान को तोड़ने में जुटे माओवादियों का सालाना बजट 16,000 करोड़ रु. है जो हर साल बढ़ रहा है।
हमें भूलना नहीं चाहिए कि कोई भी खेल या कला यदि समाज के निचले तबकों से नाता तोड़ लेती है तो वह खत्म हो जाती है। कभी-कभी तो साम्राज्य भी इस कुटेव की चपेट में आ गए हैं। रोमन साम्राज्य का झंडा कहां नहीं फहराता था। परंतु उन्होंने बहादुरी को खेल से और खेल को कारोबार से जोड़ दिया। ग्लैडिएटर यानी लड़ाके, धनिकों की मांग पर लड़ाए जाने लगे। नौजवानों का लहू देश से ज्यादा कुछ भटके रईसों की लिप्सा के लिए बहने लगा। इसके बाद जो हुआ उसे सब जानते हैं। रोम अब अपने ही खंडहरों पर आंसू बहाता है। क्या आज का क्रिकेट भी भटक नहीं रहा?
इसमें माफिया हैं, राजनेता हैं, अभिनेता हैं, चीयर लीडर्स हैं और बाजार के कारीगर हैं। सचिन के जन्मदिन पर खुश होने के साथ ही यह आशंका भी सताती है कि कहीं मास्टर ब्लास्टर इस सदी के सही अर्थों में अंतिम ‘हिन्दुस्तानी’ क्रिकेटर होकर न रह जाएं। वे बेदाग रहे हैं पर इस समय पिच पर खेल रहे हैं। कोई अन्य उन जैसा नहीं है।

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