भूख

सिंहासन है चूसता,
अब जनता का खून...
जनता भूखों मर रही,
आलू खाती भून...
आलू खाती भून,
ख़तम सब राशन कोटा...
देख तेल की धार,
दाल-आटे में टोटा...
कह प्रदीप बेफिक्र है पूंजीवादी शासन...
त्राहि-त्राहि मच रही,
किन्तु सोता सिंहासन...

सिंहासन तेरा अगर,
भूखा सोता लाल...
कर लेता एहसास,
यदि होता तू बेहाल...
होता तू बेहाल,
भूख हाय कैसी होती...
बच्चों का मुंह देख,
रूह तेरी भी रोती...
कह प्रदीप मत भरो,
तोंद में सारा राशन...
भूख करेगी क्रांति,
बचेगा क्या सिंहासन...

सिंहासन बेफिक्र है,
रहा शांत सब दीख...
महंगाई की मार से,
नहीं निकलती चीख...
नहीं निकलती चीख,
भूख से गृहिणी आकुल...
कंकर रही उबाल,
लाडले सो गये व्याकुल...
कह प्रदीप कविराय,
हाय! यह कैसा शासन...
विलासिता में मस्त,
भ्रष्ट अब भी सिंहासन...

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