Guzarte lamho me sadiya talash karta hoon, Ye meri pyas hai nadiya talash karta hoon, Yahan to log ginate hai khubiya apni, Me apne aap me kamiya talash karta hoon.
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Showing posts from April, 2009
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जो रोज़ चलती रही जि़स्म पर गोलियाँ और मनती रही खून की होलियाँ तो एक दिन हकीकत हम भूल जायेंगे होली और दिवाली से भी घबराएँगे । हो न पायेगी पहचान रंग और खून में जो पानी - सा लहू यूं ही बहता रहा अपनी परछाई भी खौफ देगी एक दिन अगर दौर कत्ल का यूँ ही चलता रहा । जो छूटते रहे उपद्रवी स्वार्थ पर फ़र्ज़ लगता रहा स्नेह के दाँव पर तो और कुछ तो अंजाम होगा नहीं बस शवों के कफ़न कम पड़ जायेंगे अब बातों से कुछ भी न हो पायेगा न बुझे दीपो की ज्योति लौट पाएगी तुम कहोगे शान्ति गर बारूद के शोर में तो ज़र्रों में शान्ति ख़ुद बिखर जायेगी अरे ! उग्रवाद के कदम रोको ज़रा जोर से नहीं तो ख़ुद ही के कदम थर्रा जायेंगे नासूर नश्तर के हाथों मिटा तो ठीक वरना हिस्से जि़स्म से अलग हो जायेंगे ।
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मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँ मैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमे गाऊं* *अपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकर* *सुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।* *लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पे* *निगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता है* *हर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में * *फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।* *ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों का* *शर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन * *जिनके **तन को ढके हैं हाथ भर की कतरन* *जिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने * *जिनकी **डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकि* *उनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई है* *चूल्हा एक बार ही जला हो घर में लेकिन * *सिर्फ़ मेहनत की खायी है, मेहनत की खिलाई है। * *नज़र में घूमती है शक्ल उन मासूमों की * *ज़िन्दगी जिनकी अँधेरा , निगाह समंदर है ,* *वीरान साँसे , पीप से भरी धंसी आँखे* *फाकों का पेट में चलता हुआ खंज़र है।* *माँ की छाती से चिपकने की उम्र है जिनकी* *हाथ फैलाये वाही राहों पे नज़र आते हैं ।* *शोभित जिन हाथों में होनी थी कलमें * *हाथ वही बोझ उठाते नज़र आते हैं ॥ * *राह में घूमते बेरोजगार नोजवानों को* *देखता हूँ तो ...