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शर्म आती है... सचमुच, शर्म आती है...

क्या कहूं... जब देश का कृषि, खाद्य आपूर्ति मंत्री किसी ठाकरे के दरबार पर जाकर मत्था टेक आता है... न न... किसानों की आत्महत्या या महंगाई रोकने के लिए नहीं (यह वे कर भी नहीं सकते), बल्कि आईपीएल में विदेशी खिलाड़ी खेल सकें, इसलिए... शर्म आती है...एक ऐसे शहर में रहता हूं, जहां सरकार नाम की शायद कोई चीज़ नहीं... एक का ही राज है - ठाकरे... क्या आम, क्या ख़ास, सबको अमन से रहने, काम करने के लिए ठाकरे का ठप्पा चाहिए, वरना देश का एक तथाकथित जिम्मेदार मंत्री, पुलिस कमिश्नर या अपनी पार्टी के गृहमंत्री तक फरियाद नहीं ले जाता... शर्म आती है...समझ नहीं आता, आखिर ऐसा क्यों है.... हर इजाज़त को 'मातोश्री' तक एड़ियां रगड़ने की दरकार क्यों होती है... क्या शर्मनाक बयान है - पहले बाल ठाकरे को प्रेजेंटेशन दिया जाएगा, और फिर अगर उन्हें अच्छा लगा, तब मुंबई में आईपीएल मैच खेले जाएंगे... शर्म आती है...कौन हैं ठाकरे... आज तक उन्होंने कोई नगर निगम चुनाव तक नहीं लड़ा... वह चुने हुए जनप्रतिनिधि नहीं... फिर उन्हें इतनी इज्ज़त बख्शने का मतलब... क्या समाज और देश के लिए उन्होंने कोई ऐसा काम कर दिया है, जिसकी हमे...

सूरज हैरान था, कहां गईं किलकारियां

इलाहाबाद [हरिशंकर मिश्र]। कुंडा तहसील के 33 गांवों में शुक्रवार की सुबह जब सूरज निकला तो उदास था। इन गांवों से रोज उठने वाली किलकारियां गायब थीं। गांव के गलियारे सूने थे और जिंदगी का नामलेवा तक न नजर आ रहा था। न घरों के चूल्हे से धुंआ उठता दिखाई दिया न चरने के लिए जानवर निकाले गये। हर गांव में किसी न किसी घर से मातम के सुर थे जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा फट सकता था। मोहमिदपुर में पार्वती के घर सुबह से ही पूरे गांव का जमावड़ा था। इस घर पर ईश्वर ने वज्रपात किया था। पार्वती की तो मौत हुई ही थी। साथ में दस साल का बेटा अभय भी मौत की भेंट हुआ था। इसी घर की बेटी थी कलावती जिसकी शादी झाझामऊ में हुई थी। वह अपने आठ साल के बेटे के साथ मायके आयी थी। दैव की मार, इन दोनों की भी मौत इस हादसे में हो गई। एक ही घर से चार-चार लाशें देख लोगों की छाती फटी जाती थी। अभय और सचिन दोनों एक ही स्कूल में कक्षा तीन के छात्र थे। साथ ही खेलते-कूदते थे और पूरे गांव की आंखों का तारा थे। इसी तरह बरई गांव में मथुरा के घर पर मातम छाया हुआ था। यहां दो बहनों 11 साल की सरिता और 12 साल की सविता की मौत हुई थी। इन दोनों बहनों मे...

ग़ज़ल

कुछ अधूरी हसरतें अश्के-रवाँ में बह गए क्या कहें इस दिल की हालत, शिद्दते-ग़म सह गए गुफ़तगू में फूल झड़ते थे किसी के होंठ से याद उनकी ख़ार बन, दिल में चुभो के रह गए जब मिले हम से कभी, इक अजनबी की ही तरह पर निगाहों से मेरे दिल की कहानी कह गए दिल के आईने में उसका, सिर्फ़ उसका अक्स था शीशा-ए-दिल तोड़ डाला, ये सितम भी सह गए दो क़दम ही दूर थे, मंज़िल को जाने क्या हुआ फ़ासले बढ़ते गए, नक़्शे-क़दम ही रह गए ख़्वाब में दीदार हो जाता तेरी तस्वीर का नींद अब आती नहीं, ख़्वाबी-महल भी ढह गए दूसरी ग़ज़ल- भूल कर ना भूल पाए, वो भुलाना याद है पास आए, फिर बिछुड़ कर दूर जाना याद है हाथ ज़ख़्मी हो गए, इक फूल पाने के लिए प्यार से फिर फूल बालों में सजाना याद है ग़म लिए दर्दे-शमां जलती रही बुझती रही रौशनी के नाम पर दिल को जलाना याद है सूने दिल में गूँजती थी, मद भरी मीठी सदा धड़कनें जो गा रही थीं, वो तराना याद है ज़िन्दगी भी छाँव में जलती रही यादें लिए आग दिल की आँसुओं से ही बुझाना याद है रह गया क्या देखना, बीते सुनहरे ख़्वाब को होंठ में आँचल दबा कर मुसकुराना याद है जब मिले मुझ से मगर इक अजनबी की ही तरह अब उमीदे-प...

ख्वाब और सच्चाई

एक बार रात को हम सैर पर निकल पडे, उस सैर में हम जिंदगी से आगे चल पड़े रस्ते में हमें एक इंसान मिला, सुंदर और जवान मिला हमने पूछा, कौन हो तुम, वो बोला- तुम मुझे नही जानते , मैं ही लोगो की जिंदगी को रंगीन बनता हु, बैठे-बैठे ही उन्हें दूर-दराज की सैर करता हु मेरी वजह से ही गरीबी और अमीरी के बीच की खाई दूर होती है , मेरी वजह से ही जिंदगी भरपूर होती ही, मेरी वजह से ही गरीब आदमी सपने सजोता है , और भूखा रहने के बावजूद चैन से सोता है, मेरी वजह से ही जिंदगी में रुबाब होता है असल में मेरा नाम ही ख्वाब होता है मैंने कहा- तुम ही ख्वाब हो , जो आदमी को पागल बनता है , और गरीब आदमी को भी भरपेट खाना मिलने का झुटा सपना दिखलाता है ख्वाब बोला मैं झूठा ही सही, पर तुम्हारी सच्चाई से तो अच्छा हु तुम्हारी सच्चाई- गरीबो और अमीरों के बीच अन्तर बनती है , जबकि मैं गरीबो और अमीरों को जोड़ता हु , झूठे ख्वाब ही दिखलाता हु , पर गरीबो के चेहरे पर कुछ पल के लिए ही सही , हसी तो छोड़ता हु

जीवन का सार

पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, " ओह, मैं कितनी अकेली हूं ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुघ नहीं लेता। " हवा ने उसका रोना सुना। उस पर तरस आया। उसने पत्ते के हिला दिया कि बूंद फिलसकर नदी में जा मिले। बूंद अकर्मण्य थी। वह कसकर पत्ते से चिपक गई, " मुझे गिरने से डर लगता है। वैसे भी नदी के जल में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठूंगी। " नदी जल की बूंद आगे बढ हुई सागर में विलीन होकर शाश्वत में मिल गई। पत्ते पर की बूंद वहीं बैठी-बैठी सूखकर समाप्त हो गई। बूंद की सबसे बडी भूल थी कि वह स्वयं को अपने जन्मदाता जल से अलग मान बैठी। वह भूल गई कि उसका अस्तित्व जल से है। दूसरी भूल थी अर्कमण्यता। वह कर्म करने से डरती रही, अत: नष्ट हो गयी। बूंद और जल का सम्बन्घ आत्मा-परमात्मा के सम्बन्घ के समान है। इतने बडे विश्व मे बच्चा अकेला आता है। परिवार, समाज में अन्य लोगों से ...

काश, वो दिन भी आता...

मैं भी कभी खुश रह पता, धूप-छांव में भी खिलखिलाता। होती न मुझको भी कोई टेंशन काश, ऐसा दिन भी कोई आता... मैं जो चाहूं कर पाऊं चैन से जरा आराम फरमाऊं। चारों तरफ हो स्वर्ग सा माहौल, नित नए कदम रोज बढ़ाता। काश, ऐसा दिन भी कोई आता... हो झोली में ढेरों खुशियां, उमंग से भरा हो नवजीवन मेरा। दुनिया को मैं कुछ समझाता , काश ऐसा दिन भी कोई आता... मेरे मन की अंतर ज्वाला में, रोज उठे एक विचार अनोखा। कर सकूं उपकार सभी का, काश ऐसा दिन भी कोई आता...
Guzarte lamho me sadiya talash karta hoon, Ye meri pyas hai nadiya talash karta hoon, Yahan to log ginate hai khubiya apni, Me apne aap me kamiya talash karta hoon.